गुरु-सेवा

एक साधू बाबा स्वयं को बहुत ही होशियार समझते थे। उनके दो चेले थे । दोनों ही चेले काफी हृष्ट-पुष्ट और लम्बे-तगड़े थे। भोजन के बाद जब साधू बाबा अपने आसन पर लेटते तो दोनों चेले बारी-बारी से आकर उनके पैर दवा जाते और जब बाबाजी को गहरी नींद आ जाती तब वे दोनों भी अपने-अपने आसन पर जाकर आराम करते ।

एक दिन बाबाजी ने सोचा, क्यों न अपनी दोनों टांगें दोनों चेलों के हवाले कर दूं । इस तरह दोनों टांगों का बंटवारा करने से खूब सेवा होगी और मुझे अधिक सुख मिल सकेगा। यह सोचकर बाबाजी ने अपनी दायी टांग एक के हवाले की और बाई टांग दूसरे को दे दी। दोनों टांगें चेलों के हवाले करने के बाद बाबाजी सुख से रहने लगे।  गुरु-सेवा | हास्य कहानी | हिंदी कहानी | Guru Seva Hindi Funny Story

चेले भी अपने हिस्से में आई हुई टांग की सेवा तन-मन से करने लगे। अपनी-अपनी टांग को मजबूत और स्वस्थ बनाने के लिए उनमें होड़ लग गई । रात-दिन मालिशें होने लगीं । टांगों को कसरतें कराई जाने लगीं और हर तरह से दोनों चले अपनी-अपनी टांगों की रक्षा में लगे रहे ।


बाबाजी बड़े चतुर थे। वे चाहते थे कि चेलों पर डांट-डपट होती रहे । इसके लिए वे कभी बाई टांग को मोटा हुआ बताते और कभी दायी टांग को अधिक स्वस्थ हुआ कहते । वे कभी एक चेले की प्रशंसा करते कभी दूसरे की, ताकि सेवा में किसी तरह की कमी न रह जाए ।  गुरु-सेवा | हास्य कहानी | हिंदी कहानी | Guru Seva Hindi Funny Story

धोरे-धोरे चेलों में मतभेद पैदा होने लगा बाबाजी के द्वारा एक की तारीफ करने पर दूसरा चिढ़ जाता । एक से एक बढ़ चढ़कर दोनों यही चाहते थे कि गुरुजी उनसे हमेशा प्रसन्न रहें। एक दिन एक चेले के मन में विचार आया, वह सोचने लगा कि यदि मैं बाबाजी की दाई टांग तोड़ दूं तो दूसरे चेले के पास क्या रह जाएगा । निश्चित ही उसकी तो छुट्टी हो जाएगी। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।

उस वक्त बाबाजी की दाई टांग का मालिक कहीं गया हुआ था। दोपहर भोजन के बाद बाबाजी ने अपने आसन पर लेट लगाई कि चेले ने उनकी दाई टांग को पकड़ लिया ।

"अरे... रे, यह क्या करते हो ?" बाबाजी चिल्ला उठे ।

"कुछ नहीं महाराज ! देखना चाहता हूं कि यह टांग कितनी मजबूत है । आप निश्चिन्त रहें । आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा।" कह कर उसने टांग को अपनी तरफ खींचा और उसे तोड़ डाला। बाबाजी दर्द के कारण बेहोश हो गये। थोड़ी देर में होश आने के बाद देखा कि टूटी हुई टाग का मालिक सामने खड़ा है।   गुरु-सेवा | हास्य कहानी | हिंदी कहानी | Guru Seva Hindi Funny Story

पीड़ा से कराहते हुए बाबाजी को देखकर पूछा तो मालूम हुआ कि बाईं टांगवाले चेले ने यह काम किया है। सुनकर वह आग-बबूला हो गया । सोचने लगा, मुझे सेवा से अलग कर वह अकेला ही बाबा की कृपा का पात्र बनना चाहता है । लेकिन मैं ऐसा कभी न होने दूंगा । सोच कर उसने उसके हिस्से वाली टांग को पकड़कर खींचा

बाबा चिल्लाये, 'ठहरो... ठहरो अब तुम यह क्या करने जा रहे हो?" क्रोध से भरे हुए चेले ने उत्तर दिया, "इस टांग के साथ मैं भी वही करूंगा जो उसने मेरी वाली टांग के साथ किया है। उसने मेरी टांग तोड़ी है, अब मैं भी इसका भुरता बना डालूंगा ।”

बाबा चिल्लायें, "अरे कम्बख्तो । ऐसा न करो। कम से कम एक टांग को तो ठीक रहने दो " बाबा ने बड़े प्रेम से उसे समझाया, "बेटा, यह टांग तो मेरी है, उसकी नहीं । इसे भी तोड़ डालेगा तो फिर मेरे पास क्या बचेगा ?"  गुरु-सेवा | हास्य कहानी | हिंदी कहानी | Guru Seva Hindi Funny Story


चेले ने उत्तर दिया, "गुरुजी ! आप ही कहते है कि दुष्ट के साथ दुष्टता ही करनी चाहिए। उसने मेरी वाली टांग तोड़ दी, जब तक मैंने उसका बदला न लिया, मुझे बिलकुल चैन न पड़ेगा। मैं इस टांग को तोड़कर ही मानूंगा ।" कह कर चेले ने दाई टांग को पकड़ कर खींचा और उसके चार टुकड़े कर दिये।   गुरु-सेवा | हास्य कहानी | हिंदी कहानी | Guru Seva Hindi Funny Story

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